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जीवन वीणा की तरह है, उसमें संगीत पैदा करने के लिए ध्यान जरुरी-स्वामी आनन्द पुनीत

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फर्रुखाबाद।ओशो रजनीश  ने अपने संन्यासियों को जीवन जीने की कला सिखाई है ।उनका कहना है कि जीवन ठीक वीणा की तरह है जिस तरह वीणा के तार बीच की स्थिति में आने से ही संगीत पैदा होता है ।उसी तरह जीवन में भी राग, विरागऔर बीतराग की स्थितियां उत्पन्न होती हैं। ओशो कहते हैं कि रागी को अगर इस बात पर अभिमान है कि उसके पास अकूत संपत्ति है, तो विरागी को इस बात का अभिमान है कि उसने करोड़ो की संपत्ति में ठोकर मार कर बैराग धारण कर लिया है । रागी को अपने पास  अकूतसंपत्ति होने का अभिमान है और विरागी को त्याग देने का अभिमान है।  इसके बीच की स्थिति है  वीतराग। वीतराग में जीने वाले को ना संपत्ति होने का अभिमान है और ना त्याग देने का अभिमान है। उसके पास जो है उसी में संतुष्ट है। वीतराग में जीने वाले व्यक्ति के जीवन में आनंद ही आनंद हो जाता है। इसे इस इस तरह से समझा जाए की जीवन वीणा की तरह है ,जिस तरह वीणा के तार अधिक कस देने पर टूट जाते हैं।  ढीला छोड़ देने पर संगीत पैदा नहीं होता ।  उसमें संगीत पैदा करने के लिए बीच की स्थिति में लाने पड़ते है।  जिससे संगीत पैदा होता है। इसी तरह से  हठयोग करके जीवन को त्यागा जा सकता है। और बिना योग के ध्यान के जीवन को नीरस बनाया जा सकता है, लेकिन संगीत पैदा करने के लिए  ध्यान से गुजरना पड़ता है। गहन ध्यान में डुबकी लगाते ही जीवन आनंद से भर जाता है और जीवन बगिया बन जाता है ।ध्यान अध्यात्म की कुंजी है । ध्यान के माध्यम से तमाम संत महात्मा आत्मा परमात्मा को जान सके हैं। ओशो का कहना है कि भूखे रहने से अगर परमात्मा मिलता तो आज हर भिखारी बुधत्व को उपलब्ध होता। उनका कहना है कि परमात्मा को हमारे उपनिषदों ने मालिक माना है। वह मालिक को ही मिलता है। आज तक किसी भिखारी को नहीं मिला । इसका उदाहरण भगवान  बुद्ध, महावीर, स्वामी विवेकानंद और रामचंद्र परमहंस हैं। वह हमेशा राजाओं को मिला है। परमात्मा रोटी से ऊपर की चीज है। 15 दिन के भूखे व्यक्ति को यदि चांद से ध्यान करने के लिए कह दिया जाए तो उसे चांद में परमात्मा का प्रतिबिंब नहीं दिखाई देगा। उसे तो आसमान में नाचती रोटी दिखाई देगी ।इसलिए जीवन में संगीत पैदा करने के लिए साधक को गहन ध्यान से गुजरना पड़ता है, तब उसका जीवन बगिया बन जाता है और उस बगिया में बसन्त बगर जाता है जहां आनंद की वर्षा होने लगती है। तब साधक कहता है कि बिन दामिनी उजियार जहां बिन घन परती फुहार ।  मगन हुआ मनुआ तहां दया  निहारि निहारि।

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